रविवार, 6 सितम्बर 2026
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SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम: पिछले दशक में आए ऐतिहासिक बदलावों का विश्लेषण

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर मौजूद वर्गों के संरक्षण का एक प्रमुख कानूनी आधार रहा है। पिछले दशक में इस कानून को अधिक प्रभावी, सख्त और पीड़ितों के अनुकूल बनाने के उद्देश्य से संसद और सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं।

इन बदलावों का चरणबद्ध विश्लेषण इस प्रकार है:

2014-2016: व्यापक प्रशासनिक और वित्तीय संशोधन

वर्ष 2014 में संसद द्वारा पारित संशोधन विधेयक को 2015 में राष्ट्रपति की सहमति मिली और यह जनवरी 2016 से प्रभावी हुआ। इस चरण में कानून के व्यावहारिक क्रियान्वयन और वित्तीय राहत पर ध्यान केंद्रित किया गया:

  • राहत राशि में भारी बढ़ोतरी: पीड़ितों के लिए सहायता राशि को बढ़ाकर न्यूनतम ₹85,000 से अधिकतम ₹8.25 लाख तक कर दिया गया।
  • त्वरित और पारदर्शी भुगतान: पुलिस FIR, मेडिकल रिपोर्ट और चार्जशीट के विभिन्न चरणों पर भुगतान की प्रक्रिया को सुलभ बनाया गया ताकि पीड़ितों को समय पर आर्थिक मदद मिल सके।
  • अपराधों के दायरे का विस्तार: कानून के तहत दंडनीय अपराधों की सूची को 22 से बढ़ाकर 47 कर दिया गया। इसमें मैला ढोने के लिए मजबूर करना, जूते की माला पहनाना, सामाजिक बहिष्कार और वोट देने से रोकना जैसी कुरीतियों को स्पष्ट अपराध माना गया।
  • विशेष अदालतें: मामलों की तेज़ सुनवाई के लिए विशेष अदालतों (Exclusive Special Courts) और विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति का प्रावधान अनिवार्य किया गया।

2018: कानूनी कठोरता और धारा 18A का समावेशन

मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद, जिसमें गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जाँच की बात कही गई थी, व्यापक जनाक्रोश देखने को मिला। इसके उत्तर में सरकार ने अगस्त 2018 में संसद के माध्यम से कानून में धारा 18A जोड़ी:

  • प्रारंभिक जाँच की आवश्यकता समाप्त: FIR दर्ज करने के लिए किसी भी तरह की प्राथमिक जाँच (Preliminary Inquiry) को अनिवार्य नहीं रखा गया।
  • बिना पूर्व अनुमति गिरफ्तारी: लोक सेवकों या अन्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए किसी वरिष्ठ अधिकारी या प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति की बाध्यता खत्म कर दी गई।
  • अग्रिम ज़मानत पर रोक: इस अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 438 लागू न होने की बात को पुनर्दृढ़ किया गया, यानी अभियुक्तों को अग्रिम ज़मानत का अधिकार नहीं दिया गया।

2026: राहत राशि में 40% वृद्धि का प्रस्ताव

आर्थिक परिस्थितियों और समय के साथ बढ़ती महंगाई को देखते हुए, सरकार ने पीड़ितों के पुनर्वास पैकेज को और मजबूत करने का कदम उठाया है:

  • अधिकतम क्षतिपूर्ति ₹12 लाख: पीड़ितों को मिलने वाली राहत राशि में लगभग 40% की वृद्धि प्रस्तावित की गई है, जिससे अधिकतम मुआवजा राशि ₹8.25 लाख से बढ़कर ₹12 लाख हो जाएगी।
  • संस्थागत ढाँचे का विस्तार: राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में समर्पित पुलिस स्टेशनों और विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाकर जाँच एवं त्वरित न्याय निष्पादन प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा रहा है।

दुरुपयोग (Misuse) के आरोप और न्यायालय की चिंताएँ

कानून के कड़े प्रावधानों के कारण इसके व्यावहारिक दुरुपयोग के मामले भी अदालतों के सामने आए हैं। शीर्ष अदालत ने कई मामलों में स्पष्ट किया है कि यह कानून “सुरक्षा की ढाल” है, “उत्पीड़न का हथियार” नहीं। दुरुपयोग से जुड़े प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • अग्रिम ज़मानत का न होना और गिरफ्तारी की तलवार: धारा 18A के तहत बिना किसी प्रारंभिक जाँच के FIR और अग्रिम ज़मानत पर रोक के कारण कई बार आपसी रंजिश, ज़मीनी विवाद, व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा या व्यक्तिगत बदला लेने के लिए इस कानून के तहत झूठी शिकायत दर्ज कराने के आरोप सामने आए हैं।
  • सिविल विवादों को आपराधिक रूप देना: सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है कि संपत्ति और निजी विवादों को जातिगत रूप देकर अभियुक्तों को फंसाने का प्रयास किया जाता है।
  • उच्चतम न्यायालय की हालिया टिप्पणियां (2024–2026):
    • सार्वजनिक स्थान (Public View) का मापदंड: अदालत ने माना कि यदि कोई घटना चार दीवारों या बंद कमरे में बिना किसी सार्वजनिक गवाह की मौजूदगी के हुई है, तो सीधे तौर पर SC/ST एक्ट लागू नहीं होगा।
    • जातिगत मंशा जरूरी: केवल गाली-गलौज या बहस होना ही काफी नहीं है, बल्कि यह साबित होना आवश्यक है कि अपमान विशेष रूप से पीड़िता की जातिगत पहचान के आधार पर ही किया गया था।
    • झूठे मामलों को खारिज करने का अधिकार: अदालतों ने संविधान/BNSS के तहत उच्च न्यायालयों के उस अधिकार को रेखांकित किया है, जिससे वे व्यक्तिगत रंजिश या झूठी मंशा से दर्ज किए गए मुकदमों (FIR) को निरस्त (Quash) कर सकती हैं।

निष्पक्ष दृष्टिकोण: सुरक्षा कवच और संतुलन की आवश्यकता

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि जहाँ इस कानून की आड़ में किसी निर्दोष को फंसाना कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है, वहीं इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि हाशिए पर मौजूद वर्गों के प्रति हिंसा और सामाजिक भेदभाव आज भी मौजूद है।

कम दोषसिद्धि दर (Low Conviction Rate) के पीछे जहाँ एक तरफ पुलिस जांच की खामियाँ, गवाहों का मुकरना या दबाव में समझौता (Compounding) मुख्य कारण होते हैं, वहीं कुछ मामलों में आधारहीन शिकायतें भी इसकी वजह बनती हैं।

बीते दस वर्षों की यात्रा यह दर्शाती है कि SC/ST अधिनियम में हुए बदलावों का मुख्य उद्देश्य न्याय प्रणाली को अधिक संवेदनशील, उत्तरदायी और सख्त बनाना रहा है। जहाँ 2016 के संशोधनों ने पीड़ितों के सामाजिक-आर्थिक पुनर्वास की नींव मजबूत की, वहीं 2018 के संशोधनों ने कानून की कानूनी मारक क्षमता को बहाल रखा। हालिया प्रस्ताव इस बात का संकेत हैं कि कानून के वित्तीय प्रावधानों को वर्तमान समय के अनुकूल प्रासंगिक बनाए रखा जा रहा है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम का मुख्य लक्ष्य सामाजिक न्याय और वंचित वर्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि जाँच एजेंसियां और अदालतें झूठी शिकायतों और वास्तविक पीड़ितों के बीच स्पष्ट अंतर करें, ताकि कानून की साख बनी रहे और किसी भी निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों का हनन न हो।

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