रविवार, 6 सितम्बर 2026
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आपदाएं क्यों प्राकृतिक नहीं होतीं?: आपदा प्रबंधन की एक नई समझ

#NoNaturalDisasters

जब भी कोई भयावह बाढ़ आती है, चक्रवात तबाही मचाता है या भूकंप से इमारतें जमींदोज होती हैं, तो समाचारों से लेकर प्रशासनिक बयानों तक में एक शब्द दोहराया जाता है—“प्राकृतिक आपदा” (Natural Disaster)। यहाँ तक कि कई अंतरराष्ट्रीय संगठन और संयुक्त राष्ट्र की कुछ एजेंसियां भी इस शब्द का प्रयोग करती हैं। लेकिन लोकनीति और आपदा प्रबंधन के आधुनिक सिद्धांतों के अनुसार सच्चाई यह है कि दुनिया में ‘प्राकृतिक आपदा’ नाम की कोई चीज नहीं होती।

प्रकृति द्वारा उत्पन्न खतरा (Hazard) प्राकृतिक हो सकता है, लेकिन किसी घटना का ‘आपदा’ (Disaster) में तब्दील होना प्राकृतिक नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ढाँचे और नीतिगत फैसलों की विफलता का परिणाम होता है।

खतरे और आपदा का अंतर: लोकनीति का दृष्टिकोण

आपदा विज्ञान और लोकनीति इसे एक सरल समीकरण के जरिए समझाती है:

$$\text{आपदा (Disaster)} = \text{खतरा (Hazard)} + \text{संपर्क (Exposure)} + \text{संवेदनशीलता (Vulnerability)}$$

  • प्रकृति का खतरा (Natural Hazard): चक्रवात, भूकंप, मूसलाधार बारिश या नदियों का उफान—ये सभी प्राकृतिक प्रक्रियाएं हैं। जब तक ये घटनाएं किसी निर्जन इलाके या इंसान विहीन क्षेत्र में होती हैं, ये सिर्फ भौतिक परिघटनाएं या ‘खतरे’ हैं।
  • आपदा की स्थिति: यह खतरा आपदा का रूप तब लेता है, जब यह किसी ऐसे मानवीय समुदाय पर हमला करता है जहाँ सुरक्षा तंत्र कमजोर हो। गरीबी, सामाजिक वंचना, खराब शहरी नियोजन (Urban Planning) और बुनियादी ढांचे के अभाव के कारण जब आबादी संवेदनशील (Vulnerable) हो जाती है, तब वही खतरा विनाशकारी ‘आपदा’ बनता है।

जंगलों की आग, मरुस्थलीकरण या रासायनिक रिसाव जैसी घटनाएं जब पारिस्थिकी और इंसानी बस्तियों को तबाह करती हैं, तो उसका आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक नुकसान समुदायों को उठाना पड़ता है। लेकिन इन सबके पीछे प्रकृति नहीं, बल्कि योजनागत कमियां जिम्मेदार होती हैं।

“प्राकृतिक आपदा” शब्द कहना प्रशासनिक जिम्मेदारी से भागना है

किसी भी विनाशकारी घटना को “प्राकृतिक आपदा” घोषित कर देना असल में तबाही की जिम्मेदारी लेने से साफ मुकरना है। जब नीति-निर्माता और प्रशासन तबाही को ‘प्रकृति का प्रकोप’ बता देते हैं, तो इससे घटिया निर्माण कार्य, अवैध शहरीकरण, पूर्व-चेतावनी तंत्र की नाकामी और सामाजिक सुरक्षा की कमियों पर पर्दा पड़ जाता है।

लोकनीति के जरिए हम किसी भी प्राकृतिक खतरे को आपदा बनने से रोक सकते हैं:

  • सटीक पूर्व चेतावनी और योजना: समय रहते सटीक मौसम पूर्वानुमान, चेतावनी तंत्र और सुरक्षित निकासी नीतियां लागू करके।
  • संवेदनशील वर्गों का संरक्षण: नीति-निर्माण में समाज के सबसे गरीब, कमजोर और हाशिये पर मौजूद वर्गों को प्राथमिकता देकर।
  • आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचा: ऐसे घरों, पुलों और सड़कों का निर्माण करके जो भूकंप और चरम मौसम के थपेड़ों को सह सकें।
  • आर्थिक लचीलापन: आपदा के बाद पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था बनाना, ताकि प्रभावित आबादी गरीबी के दुष्चक्र में न फँसे।

निष्कर्ष

यह समझना लोकनीति का मूल आधार है कि प्राकृतिक खतरों को तो हम नहीं रोक सकते, लेकिन उन्हें तबाही और ‘आपदा’ बनने से रोकना पूरी तरह से इंसानी फैसलों, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।

इसलिए, जब भी आप “प्राकृतिक आपदा” शब्द सुनें, तो लोकनीति के इस बुनियादी यथार्थ को जरूर याद रखें—“खतरा प्राकृतिक हो सकता है, लेकिन आपदाएं कभी प्राकृतिक नहीं होतीं।”

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