शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026
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बिहार के भगीरथ: स्वतंत्रता के महानायक और आधुनिक निर्माण के शिल्पी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह

विशेष आलेख | ‘बिहार केसरी’ डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की पावन जयंती पर विशेष प्रस्तुति

इतिहास के पन्नों में दर्ज एक अमर अध्याय

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और आज़ाद भारत के प्रशासनिक व राजनीतिक पुनर्जागरण का इतिहास उन महापुरुषों के बिना अधूरा है, जिन्होंने अपने स्वार्थ, सुख और व्यक्तिगत जीवन की बलि देकर राष्ट्र-निर्माण की कठिन राह चुनी। ऐसे ही विरल, अद्वितीय और अप्रतिहत जननायक थे—‘बिहार केसरी’ डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, जिन्हें पूरा देश और बिहार की जनता अपार स्नेह से ‘श्रीबाबू’ कहकर पुकारती है।

श्रीबाबू केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं थे; वे स्वतंत्रता संग्राम के दुर्धर्ष योद्धा, प्रखर विचारक, प्रशासनिक कुशलता के मानदंड और आधुनिक बिहार के सच्चे शिल्पी थे। उनके जीवन का संपूर्ण दर्शन केवल चार शब्दों में सिमटा हुआ था— “पहले देश, फिर शेष।” आज उनकी जयंती के अवसर पर लोकनीति आपके समक्ष उनके जीवन, उनके संघर्ष और उनके दूरदर्शी शासनकाल का एक विशद ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा है।

बाल्यावस्था का संकल्प: गीता और कटार के समक्ष ली गई अमर प्रतिज्ञा

श्रीबाबू का जन्म और पालन-पोषण जिस वातावरण में हुआ, वहाँ राष्ट्रवाद की लहरें हिलोरें ले रही थीं। उनके भीतर देशभक्ति की लौ बाल्यावस्था से ही अत्यंत तीव्र गति से प्रज्वलित हो चुकी थी। उनके जीवन की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और ऐतिहासिक घटना मुंगेर के सुप्रसिद्ध कष्टहरणी घाट से जुड़ी हुई है।

कहा जाता है कि बाल्यावस्था में श्रीबाबू का संपर्क गरम दल की क्रांतिकारी विचारधारा से जुड़े एक बंगाली शिक्षक से हुआ। एक मध्य रात्रि को गंगा के तट पर उस शिक्षक के मार्गदर्शन में युवा श्रीकृष्ण सिंह ने अपने एक हाथ में पवित्र श्रीमद्भगवद्गीता और दूसरे हाथ में तीक्ष्ण कटार लेकर यह निष्ठावान संकल्प लिया था:

“चाहे प्राणों की आहुति ही क्यों न देनी पड़े, मैं जीवन में कभी भी मातृभूमि की सेवा और राष्ट्रहित के मार्ग से विचलित नहीं हूँगा।”

यह केवल एक बचकाना उत्साह नहीं था, बल्कि एक ऐसा महाव्रत था जिसे उन्होंने अपने जीवन के अंतिम सांस तक निभाया।

औपनिवेशिक दासता से तीव्र घृणा: जब बंद कर ली गई थीं खिड़कियाँ

श्रीबाबू के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्हें विदेशी हुकूमत और गुलामी के किसी भी प्रतीक से गहरी चिढ़ थी। दिसंबर 1911 का प्रसंग इस बात का ज्वलंत प्रमाण है। जब ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम भारत आए और पटना आगमन के दौरान गंगा नदी में नौकाविहार करने निकले, तो अंग्रेजी हुकूमत के इस ‘बादशाह’ की एक झलक पाने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ा था।

परंतु, उस समय पटना कॉलेज में उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे युवा छात्र श्रीबाबू के मन में इस घटना से तीव्र प्रतिक्रिया हुई। अपने ही देशवासियों को गुलामी के प्रतीक एक विदेशी शासक का अभिवादन करते देख उनका हृदय व्यथित हो उठा। उन्होंने तुरंत अपने हॉस्टल के कमरे के दरवाजे और खिड़कियाँ पूरी तरह बंद कर लीं, ताकि इस ‘गुलामी के दृश्य’ को देखने का अनजाने में भी कोई पाप उन पर न चढ़े। देश के स्वाभिमान के प्रति ऐसी तीखी चेतना बहुत कम युवाओं में देखने को मिलती थी।

असहयोग आंदोलन और आठ वर्षों की कठोर कारावास यात्रा

सन् 1921 में जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ‘असहयोग आंदोलन’ का बिगुल फूंका, तब श्रीबाबू एक स्थापित और सफल वकालत के पेशे में थे। लेकिन मातृभूमि का बुलावा आते ही उन्होंने अपनी चलती वकालत को एक झटके में त्याग दिया और पूर्णकालिक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मैदान में कूद पड़े।

इसके बाद उनका पूरा जीवन संघर्षों, लाठीचार्ज और जेल की सलाखों के बीच बीतने लगा। घुमा-फिराकर उन्होंने अपने जीवन के लगभग आठ बहुमूल्य वर्ष अंग्रेजों की विभिन्न जेलों में काटे। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत की यातनाएँ उनके मनोबल को कभी डिगा नहीं सकीं।

व्यक्तिगत आघात बनाम राष्ट्रधर्म: 1940 का वह ऐतिहासिक परीक्षा-क्षण

श्रीबाबू के महान नैतिक चरित्र और साहस की असली परीक्षा सन् 1940 के सत्याग्रह के दौरान हुई। उस समय उनकी धर्मपत्नी गंभीर रूप से अस्वस्थ होकर पटना के पीएमसीएच (PMCH) अस्पताल में भर्ती थीं। श्रीबाबू स्वयं भी अस्वस्थ चल रहे थे और अस्पताल में पत्नी की देखरेख में लगे हुए थे।

ब्रिटिश प्रशासन जानता था कि श्रीबाबू बाहर रहे तो आंदोलन विकराल रूप ले लेगा। पटना के तत्कालीन ब्रिटिश कमिश्नर मि. लेसी ने उनके सामने एक प्रस्ताव रखा: यदि वे इस आशय के शपथपत्र पर हस्ताक्षर कर दें कि जब तक वे पटना में पत्नी के इलाज के लिए रहेंगे, किसी भी आंदोलन या सत्याग्रह में भाग नहीं लेंगे, तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे उनके अभिन्न साथियों और शुभचिंतकों ने भी उनकी पारिवारिक परिस्थिति को देखते हुए उन्हें संयम बरतने की सलाह दी। परंतु, अपनी मरणासन्न पत्नी की ममता और व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर उठकर श्रीबाबू ने उस औपनिवेशिक शर्त को सीधे ठुकरा दिया। उन्होंने विदेशी हुकूमत के आगे घुटने टेकने के बजाय जेल जाना और आंदोलन का नेतृत्व करना चुना।

17 अप्रैल को वे मुंगेर से अपने सत्याग्रही जत्थे के साथ निकले और लगभग 40 मील की पैदल यात्रा करते हुए 20 अप्रैल को बेगूसराय के गढ़पुरा पहुँचे, जहाँ उन्होंने उबलते कड़ाहों से खौलता नमक उठाकर अपने हाथों में ले लिया और नमक सत्याग्रह को ऐतिहासिक सफलता प्रदान की।

आधुनिक बिहार का स्वर्णिम युग: प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में प्रशासनिक दृष्टिकोण

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत, जब बिहार के पुनर्गठन और शासन की बागडोर संभालने की बात आई, तो सर्वसम्मति से डॉ. श्रीकृष्ण सिंह को बिहार का प्रथम मुख्यमंत्री चुना गया। उनके दूरदर्शी नेतृत्व में 1946 से 1961 (उनके निधन तक) का समय “आधुनिक बिहार का स्वर्णिम काल” माना जाता है।

मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने बिहार में विकास की एक अभूतपूर्व लहर चलाई:

  1. जमींदारी प्रथा का उन्मूलन: भारत में सबसे पहले जमींदारी प्रथा को समाप्त करने का ऐतिहासिक और साहसिक कानून बिहार में श्रीबाबू के नेतृत्व में ही पास हुआ।
  2. औद्योगिक क्रांति: बरौनी रिफाइनरी, बरौनी थर्मल पावर स्टेशन, हटिया का भारी उद्योग (HEC Ranchi – तत्कालीन बिहार), बोकारो स्टील प्लांट की नींव और डालमियानगर का औद्योगिक परिसर उन्हीं की दूरदर्शिता की देन थे।
  3. शिक्षा और शोध संस्थान: पटना विश्वविद्यालय का सुदृढ़ीकरण, मुजफ्फरपुर और भागलपुर विश्वविद्यालयों की स्थापना, और कई इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेजों का निर्माण उनके कार्यकाल में हुआ।
  4. कृषि एवं सिंचाई: कोसी परियोजना और गंडक परियोजना जैसे विशाल नदी-घाटी प्रोजेक्ट्स की नींव रखकर उन्होंने बिहार के किसानों को बाढ़ से राहत देने और सिंचाई क्षमता बढ़ाने का भगीरथ प्रयास किया।

निष्पक्षता, धर्मनिरपेक्षता और समावेशी राजनीति के अग्रदूत

श्रीबाबू की राजनीति का सबसे उज्ज्वल पक्ष यह था कि वे जातिवाद और संकीर्ण क्षेत्रीयता से कोसों दूर थे। उनके मंत्रिमंडल में डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह (‘बिहार विभूति’) जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर काम करने की जो संस्कृति विकसित हुई, उसने बिहार के प्रशासनिक ढांचे को भारत भर में अनुकरणीय बना दिया था। उस दौर में बिहार प्रशासन को देश के सबसे कुशल और पारदर्शी प्रशासनों में गिना जाता था।

देवघर के प्रसिद्ध वैद्यनाथ धाम मंदिर में दलितों का प्रवेश कराने के लिए श्रीबाबू ने जो साहसिक कदम उठाया, वह भारतीय सामाजिक सुधार के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है। परंपरावादियों के भारी विरोध के बावजूद उन्होंने स्वयं दलित समाज के लोगों का हाथ पकड़कर मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कराया था।

इतिहास का ऋणी बिहार और हमारी भावी दृष्टि

गंभीरता से विचार करें तो 1920 से लेकर 1961 तक का बिहार का इतिहास, वास्तव में डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के संघर्ष और संकल्पों का ही इतिहास है। वे एक ऐसे राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने राजनीति को सत्ता का साधन नहीं, बल्कि जनसेवा और राष्ट्र-निर्माण का पवित्र माध्यम माना।

आज जब राजनीतिक परिदृश्य में नैतिक मूल्यों की कमी, जातिगत विभाजन और क्षणिक लोकलुभावन नीतियों का बोलबाला दिखता है, तब श्रीबाबू का जीवन और उनके आदर्श हमें एक दिशा दिखाते हैं। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि वास्तविक नेतृत्व वह है जो आने वाले चुनावों की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चिंता करता है।

उनकी जयंती के इस पावन अवसर पर ‘लोकनीति’ परिवार इस महान राष्ट्रपुत्र, अद्वितीय स्वतंत्रता सेनानी और आधुनिक बिहार के भगीरथ डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करता है।

“हे युगपुरुष महान! तुम्हारी जय हो! हे नरता के अभिमान! तुम्हारी जय हो!”

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