जब लदमा में गूंजी थीं 3000 गोलियां: एसटीएफ के उस एनकाउंटर की कहानी
विशेष रिपोर्ट | लोकनीति
बिहार के राजनीतिक और आपराधिक इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाता है, तो कुछ तारीखें और घटनाएं ऐसी मिलती हैं जो उस दौर के ‘जंगलराज’ की पूरी दास्तां बयां कर देती हैं। बात मई 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद की है। बाढ़ संसदीय सीट से नीतीश कुमार चुनाव हार चुके थे और बाहुबली अनंत सिंह के धुर विरोधी माने जाने वाले विजय कृष्णा ने वहां जीत दर्ज की थी। उस समय तक राज्य में स्पेशल टास्क फोर्स (STF) का गठन वर्ष 2000 में हो चुका था। बढ़ते अपराध और बाहुबलियों के वर्चस्व को तोड़ने के लिए अनंत सिंह और उनके साथियों पर शिकंजा कसने का मास्टरप्लान तैयार किया गया।
एसटीएफ का वो खूफिया ऑपरेशन और लदमा गांव की घेराबंदी
अपराधियों तक पहुंचने के लिए एसटीएफ की 3 बड़ी टुकड़ियां तैयार की गईं। उस समय के तीन तेज तर्रार डीएसपी—संजय कुमार सिंह, मनोज तिवारी और विश्वजीत दयाल के नेतृत्व में 45-45 जवानों की फौज इस ऑपरेशन के लिए रवाना हुई।
2 अगस्त 2004 की भोर में करीब 3 बजे एसटीएफ की टीमें बाढ़ स्थित अनंत सिंह के पैतृक गांव लदमा में दाखिल हुईं। गाड़ियों के सीधे शोर के साथ गांव में घुसने से ऑपरेशन का राज खुल सकता था, इसलिए पुलिस ने खेतों और पिछले रास्तों का चुनाव किया। अगस्त का महीना था, झमाझम बारिश और कीचड़ से रास्तों का बुरा हाल था, लेकिन जवानों ने किसी तरह खेतों के रास्ते गांव को तीन तरफ से घेर लिया।
जब गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठा इलाका
घेराबंदी के दौरान अनंत सिंह के घर पर पहरा दे रहे उनके गुर्गों की नजर पुलिस पर पड़ गई। एसटीएफ टीम के अनुसार, गोलियां दूसरी तरफ से पहले चलीं, जिसकी चपेट में आकर एसटीएफ के वीर जवान रघुवंश सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए।
उन्हें तुरंत बाढ़ के सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां से स्थिति गंभीर होने पर पीएमसीएच (PMCH) रेफर किया गया, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया। जवान की शहादत के बाद दोनों तरफ से भीषण और धुआंधार फायरिंग शुरू हो गई। 3 अगस्त 2004 के अखबारों में जब इस मुठभेड़ की खबरें छपीं, तो खुलासा हुआ कि दोनों पक्षों के बीच 3000 से अधिक राउंड गोलियां चली थीं। अनंत सिंह के दावे के मुताबिक इस घटना में उनके 8-9 लोग मारे गए थे, जिनमें सबसे पहले भीम सिंह को गोली लगी थी। इसके अलावा टेनी मियाँ, चिंटू कुमार, बाल्मीकि सिंह, सुनील कुमार, शैलेश कुमार, रजनीश कुमार और सुरेंद्र कहार भी इसी खूनी संघर्ष में मारे गए थे।
बूथ कैप्चरिंग का दौर और टी.एन. शेषन की याद
जब भी बिहार के उस पुराने दौर की चर्चा होती है, तो लोगों को बैलट पेपर (मतपत्र) लूटने और बूथ कैप्चरिंग की वो काली कहानियां याद आ जाती हैं। मतपत्रों से भरी पेटियों को उठाकर कुएं या तालाब में फेंक देना, ताकि कागज भीगकर बेकार हो जाएं और आम मतदाता कभी पोलिंग बूथ तक पहुंच ही न सकें—यह उस समय की आम हकीकत हुआ करती थी। देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन को आज भी इसी बात के लिए याद किया जाता है कि उन्होंने 1990 के दशक के उस चुनौतीपूर्ण दौर में बिहार जैसे राज्य में अपनी कड़ी प्रशासनिक क्षमता के बल पर निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराए थे।
चुनावी आहट और जनता की जागी हुई चेतना
आज जब राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर पुराने तौर-तरीकों या मतपत्रों की वापसी की बातें उठती हैं, तो इतिहास के ये पन्ने हमें आगाह करते हैं कि हम किस व्यवस्था से निकलकर आएं हैं।
बिहार में हालिया या आगामी एमएलसी चुनावों से भले ही सत्ता की सरकार या सूरत न बदले, लेकिन ऐसे चुनाव यह जरूर याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र में जनता की सजगता सबसे बड़ी ताकत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मतदाता अपने विवेक, सावधानी और सूझबूझ से ही अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, ताकि लोकतंत्र की गरिमा और सुरक्षा दोनों बनी रहें।