सफलता के शिखर से ‘निदान’ के मुहाने तक: विनोद कांबली

विशेष आलेख | लोकनीति
चौदह पारियों में हजार टेस्ट रन और चौदह बार रिहैब का सफर—ये दोनों आंकड़े किसी अलग-अलग इंसान के नहीं, बल्कि एक ही शख्स की कहानी कहते हैं। पहली गिनती अखबारों की सुर्खियां बनी थीं, तो दूसरी को उस खिलाड़ी ने खुद पूरी ईमानदारी से स्वीकार किया है।
हाल ही में ठाणे से विनोद कांबली का एक वीडियो सामने आया। कैमरे के सामने अपना नाम बताते हुए उनकी जुबान लड़खड़ाती है, लेकिन वे बहुत सहजता से कहते हैं— “यहाँ अपनों जैसा प्यार मिला है, साफ-सुथरा माहौल है और ऐसा बिल्कुल महसूस नहीं होता कि मैं अपने घर पर नहीं हूँ।” इसके बाद वे खुद से ही पूछते हैं, “और मैं हूँ कहाँ?” और खुद ही जवाब देते हैं— “निदान में।”
जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। किसी ने लिख दिया कि सचिन तेंदुलकर का यह पुराना साथी किसी बेसहारा वृद्धाश्रम में जीवन काट रहा है, तो किसी ने यह प्रचारित कर दिया कि उनके परिवार ने उन्हें तन्हा छोड़ दिया है। हालांकि, जब इन दावों की असलियत टटोली गई, तो तस्वीर इसके बिल्कुल उलट नजर आई।
कांजुरमार्ग की तंग गलियों से चमकते मैदान तक
मुंबई के कांजुरमार्ग की एक साधारण चाल में पले-बढ़े विनोद का जीवन संघर्षों से भरा था। उनके पिता गणपत कांबली एक मैकेनिक थे, और घर का चूल्हा इसी एक सहारे पर जलता था। कम उम्र में ही विनोद किट उठाए लोकल ट्रेनों की भारी भीड़ को चीरते हुए शिवाजी पार्क पहुँचते थे, जहाँ महान कोच रमाकांत आचरेकर उन्हें क्रिकेट के गुर सिखाते थे। उसी मैदान पर उनके साथ एक और होनहार लड़का अभ्यास करता था—सचिन।
वर्ष 1988 के एक स्कूल मैच में इन दोनों ने मिलकर 664 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी की, जिसमें दोनों में से कोई बल्लेबाज आउट नहीं हुआ था। दुनिया ने पहली और बार एक साथ दोनों का नाम जाना, और उस दिन स्कोरबोर्ड पर सचिन से ज्यादा रन विनोद के नाम दर्ज थे।
इसके बाद के कुछ साल उनके करियर के सबसे सुनहरे दिन रहे। इक्कीसवें जन्मदिन पर वनडे शतक और उसी उम्र में लगातार दो टेस्ट मैचों में दोहरे शतक। सबसे कम मैचों में हजार टेस्ट रन पूरे करने वाले वे पहले भारतीय बने—एक ऐसा कीर्तिमान जो आज भी अटूट है। वानखेड़े के मैदान पर जब उन्होंने दोहरा शतक जड़ा, तो इंग्लैंड के दिग्गज खिलाड़ी ग्राहम गूच और माइक गैटिंग ने खुद उनके पास आकर उनकी पीठ थपथपाई थी। एक आम चाल से निकला लड़का आज दुनिया की नजरों का तारा बन चुका था।
शिखर से पतन और तन्हाई का दौर
किस्मत की उड़ान जितनी तेजी से भरी गई, उतनी ही तेजी से वह नीचे भी आई। महज तेईस साल की उम्र में उन्होंने अपना आखिरी टेस्ट मैच खेल लिया।
फिर आया 13 मार्च 1996 का वह मनहूस दिन। कोलकाता के ईडन गार्डन्स में विश्व कप का सेमीफाइनल मुकाबला खेला जा रहा था। जब मैच भारत की पकड़ से बाहर जाने लगा, तो दर्शक उग्र हो गए और स्टैंड्स में आगजनी के कारण खेल रोकना पड़ा। महज 10 रन बनाकर नाबाद रहे विनोद जब मैदान से बाहर लौट रहे थे, तो उनकी आँखों में आंसू थे—वह तस्वीर आज भी देश के जेहन में एक टीस की तरह दर्ज है।
खेल मामलों के जानकारों का मानना है कि जो खिलाड़ी अपनी शुरुआती पहचान सिर्फ और सिर्फ खेल से बना लेता है, मैदान छूटने के बाद उसकी दुनिया सूनी हो जाती है। ड्रेसिंग रूम का साथ छूटने पर उपजा वह खालीपन उसे भीतर से खोखला करने लगता है। कांबली के साथ भी शायद कुछ ऐसा ही हुआ। साल 2009 में उन्होंने एक फिल्म में काम किया, ‘बिग बॉस’ के घर का हिस्सा बने, टेलीविजन पर अपनी भड़ास निकाली और राजनीति में किस्मत आजमाते हुए विधानसभा चुनाव भी लड़े। वे हर वो दरवाजा खटखटा रहे थे, जो उन्हें उनके अतीत के सुनहरे मैदान तक वापस ले जा सके।
दोस्ती के गिले-शिकवे और मरहम
उसी दौर के एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने यह कह दिया था कि यदि सचिन चाहते, तो इस बुरे वक्त में उनकी और मदद कर सकते थे। इस एक बयान ने बचपन के उस अटूट रिश्ते में बरसों की दूरी पैदा कर दी।
परंतु सच्चे रिश्ते वक्त की कसौटी पर परखने के बाद और मजबूत होते हैं। नवंबर 2013 में जब सचिन ने वानखेड़े स्टेडियम से अपने विदाई भाषण में विनोद का जिक्र नहीं किया, तो उनका दिल जरूर टूटा। लेकिन उसी महीने जब विनोद को दिल का दौरा पड़ा और लीलावती अस्पताल में उनकी दो बड़ी सर्जरी हुईं, तब बरसों बाद यह सच सामने आया कि उन ऑपरेशनों का सारा खर्च सचिन ने ही उठाया था।
वर्ष 2017 में दोनों पुराने यार गले मिले और गिले-शिकवे मिटाए। साल 2024 में विनोद ने खुद स्वीकार किया— “उस समय मैं भारी मानसिक तनाव में था, इसलिए मुझे ऐसा लगा कि सचिन ने मेरी मदद नहीं की। पर सच तो यह है कि उसने मेरे लिए सबकुछ किया।” टूटा हुआ इंसान अक्सर अपने सबसे करीब खड़े शख्स पर ही अपना गुस्सा निकालता है।
नशे की दलदल और अपनों का अटूट संबल

इस मानसिक उथल-पुथल के बीच एक और बड़ी चुनौती उनकी जिंदगी में घर कर चुकी थी—शराब की लत। इसकी शुरुआत कब हुई, इसका कोई आधिकारिक ब्योरा नहीं है, लेकिन उनका खुद का खुलासेदार कबूलनामा यह है कि वे चौदह बार रिहैब केंद्र जा चुके हैं।
जिन्होंने यह हवा फैलाई थी कि उनके परिवार ने उनका साथ छोड़ दिया है, वे सच्चाई से कोसों दूर थे। उनकी पत्नी एंड्रिया ने एक बातचीत में साझा किया था कि वर्ष 2023 में उन्होंने तलाक के कागजात तैयार किए थे, लेकिन बाद में कदम पीछे खींच लिए। उनके मन में बस यही विचार आया कि “यदि मैं चली गई, तो यह इंसान पूरी तरह बिखर जाएगा, यह आज भी बच्चों जैसा मासूम है।” कई बार वे घर से गुस्से में बाहर निकलतीं, लेकिन रास्ते में ही ख्याल आता— “उसने कुछ खाया होगा या नहीं? वह ठीक तो होगा?” और वे वापस लौट आतीं।
उनके छोटे भाई वीरेंद्र ने भी हमेशा मीडिया के सामने आकर उनकी सेहत की जानकारी दी और लोगों से दुआ की अपील की। उन्होंने बताया कि सचिन लगातार फोन पर उनका हाल लेते रहते हैं। सुनील गावस्कर की संस्था ने भी उनके नाम पर मासिक आर्थिक सहायता बांध दी। ठाणे के जिस ‘निदान सेंटर’ को लोग वृद्धाश्रम समझकर भ्रमित हो रहे थे, उसके संस्थापक महेश नाइक ने साफ किया कि विनोद को उसी अस्पताल से यहाँ भेजा गया था। नाइक कहते हैं— “वे हमारे हीरो हैं, जब तक चाहें यहाँ सम्मान के साथ रह सकते हैं।”
बीमारी की सही पहचान ही असली ‘निदान’ है
संस्कृत और आयुर्वेद में ‘निदान’ का मतलब होता है— किसी भी रोग के मूल कारणों का पता लगाना। दवा और उपचार बाद की प्रक्रिया है, सबसे पहले मर्ज की शिनाख्त जरूरी है।
हमारे समाज में अक्सर नशे की लत को इंसान की ‘बुरी आदत’ या उसकी ‘जिद’ मान लिया जाता है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान इसे एक मानसिक विकार मानता है, जिसका वैज्ञानिक उपचार संभव है। अमेरिकी संस्था एनआईडीए (NIDA) के मुताबिक, यदि कोई मरीज इलाज के बाद फिर से ट्रैक से उतर जाता है, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि उसका इलाज विफल हो गया। उच्च रक्तचाप या मधुमेह की तरह, लक्षण उभरने पर चिकित्सा प्रक्रिया को नए सिरे से आगे बढ़ाया जाता है, न कि उसे हमेशा के लिए छोड़ दिया जाता है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (AIIMS) के एक पूर्व अध्ययन की तर्ज पर देखें तो देश में करोड़ों लोग इस तरह की गंभीर निर्भरता के शिकार हैं, जिनमें से बमुश्किल कुछ ही लोगों को समय पर सही चिकित्सीय मदद मिल पाती है। बाकी लोग उस सामाजिक संकोच और चुप्पी में जीते हैं, जहाँ बीमारी का खुलकर जिक्र करना भी गुनाह समझा जाता है।
विनोद की कहानी इस चुप्पी को तोड़ने का काम करती है। नए साल की शुरुआत में जब वे अस्पताल से बाहर आए, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में युवाओं को आगाह किया कि नशे से दूरी बनाए रखें। जो इंसान खुद चौदह बार इस जंग से गुजरा हो, उसके मुँह से यह बात निकलना उसकी बहादुरी बयां करती है।
अप्रैल के महीने में वे एक विज्ञापन के जरिए फिर से कैमरे के सामने आए। मई में वे वानखेड़े के मैदान पर भी नजर आए—हालाँकि इस बार उनके कदम थोड़े डगमगा रहे थे और उन्हें दो लोगों का सहारा लेना पड़ा था, लेकिन उनके चेहरे पर एक आत्मविश्वासी मुस्कान थी।
क्रिकेट के पिच पर उनकी पहली पारियां भले ही तूफानी रही हों और दूसरी पारियां जल्दी सिमट गई हों, लेकिन जिंदगी की इस लंबी पारी में वे आज भी हार मानने को तैयार नहीं हैं। लड़खड़ाती जुबान और कमजोर होते कदमों के साथ भी उनका यह कहना कि “अभी मेरा इलाज चल रहा है”—यह साबित करता है कि वे भीतर से कितने मजबूत हैं।
यह गाथा सिर्फ एक असफल या सफल खिलाड़ी की नहीं है, बल्कि हर उस परिवार के लिए एक प्रेरणा है जो अपने किसी अपने को इस दलदल से बाहर निकालने की जद्दोजहद कर रहा है। गिरना या फिसलना कोई पराजय नहीं है, असली हार तो तब होती है जब इंसान ठीक होने की उम्मीद छोड़ देता है।