संख्या सच की गारंटी नहीं है
एम्मा गोल्डमैन का सौ साल पुराना तर्क आज के वायरल समाज में कितना प्रासंगिक है?
सोशल मीडिया के दौर में सच अक्सर उन बातों को माना जाने लगा है जो सबसे ज़्यादा दिखाई देती हैं—जिनके व्यूज़ लाखों में हों, जो ट्रेंड कर रही हों, जिन्हें सब शेयर कर रहे हों। प्रश्न यह है कि क्या संख्या अपने आप में सत्य का प्रमाण बन गई है?करीब एक शताब्दी पहले अराजकतावादी विचारक एम्मा गोल्डमैन ने अपने निबंध Minorities versus Majorities (1910) में इसी प्रवृत्ति पर प्रहार किया था। उनका मूल तर्क यह था कि आधुनिक जीवन मात्रा पर टिका है, गुणवत्ता पर नहीं। राजनीति, उत्पादन और शिक्षा—सब जगह संख्या हावी हो गई है। बहुमत में मौलिकता और नैतिक साहस की कमी होती है; वह अक्सर नेताओं और प्रचलित धारणाओं के पीछे चलता है। इतिहास में ज्ञान, स्वतंत्रता और सुधार की पहल आमतौर पर उन अल्पसंख्यकों से आई है, जो भीड़ के विरुद्ध खड़े होने का जोखिम उठाते हैं।
गोल्डमैन जाति या धर्म के अर्थ में अल्पसंख्यक की बात नहीं कर रही थीं। वे उन स्वतंत्र मस्तिष्कों की बात कर रही थीं जो प्रचलित धारणा से अलग सोचने का साहस रखते हैं।
संख्या का भ्रमआज सत्य की परीक्षा अक्सर मेट्रिक्स से होती है—कितने व्यूज़, कितने लाइक, कौन-सा हैशटैग चल रहा है। गोल्डमैन का संकेत यही था कि बड़ी संख्या किसी बात को सही नहीं बना देती। दस करोड़ लोग किसी प्रचार, अफवाह या सतही चलन को अपना लें, तो भी वह अपने आप सत्य नहीं हो जाता। मात्रा कभी-कभी गुणवत्ता को दबा देती है।
यह चेतावनी आज के प्लेटफॉर्म युग में और तीखी लगती है। एल्गोरिदम वही दिखाते हैं जो ध्यान खींचे—गुस्सा, भय, सरल नारे। सोचने की जगह प्रतिक्रिया देने की आदत पड़ जाती है ।
भीड़ और असहमति का डर
गोल्डमैन ने बहुमत को इसलिए आलोचना का विषय बनाया क्योंकि वह ज़िम्मेदारी लेने से बचता है और अलग राय रखने वालों पर दबाव बनाता है। आज यह दबाव कैंसिल कल्चर, ट्रेंड के विरुद्ध बोलने के डर और “सब ऐसा ही कह रहे हैं” वाली मानसिकता के रूप में दिखाई देता है।
यहाँ संतुलन ज़रूरी है। लोकतंत्र में बहुमत का महत्व है। चुनाव, कानून और सामूहिक निर्णय संख्या पर ही टिकते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब संख्या सोच का स्थान ले लेती है—जब कोई बात इसलिए सही मानी जाने लगे कि वह लोकप्रिय है, इसलिए नहीं कि वह जाँची-परखी है। अल्पसंख्यक भी हमेशा सही नहीं होती। इतिहास में संकीर्ण और प्रतिक्रियावादी अल्पसंख्यक भी रहे हैं। गोल्डमैन का निबंध पूर्ण सत्य नहीं, एक चेतावनी है।
बदलाव कहाँ से आता हैगोल्डमैन का विश्वास व्यक्ति की क्षमता में था। उनका कहना था कि सामाजिक और आर्थिक बेहतरी भीड़ के झुकाव से नहीं, बल्कि उन लोगों के साहस और हठ से आती है जो प्रचलित व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं। गुलामी, वैज्ञानिक खोज, प्रेस की स्वतंत्रता—कई बड़े बदलाव पहले अल्पमत में शुरू हुए।
आज का संदर्भ अलग है: डिजिटल लत, कॉर्पोरेट एकाधिकार, सूचना की बाढ़। जो व्यक्ति इन पर स्वतंत्र रूप से सोचता है, वही गोल्डमैन के अर्थ में “अल्पसंख्यक” है—न कि कोई विशेष पहचान वाला समूह।
एम्मा गोल्डमैन किसी व्यवस्था के सामने विवेक गिरवी रखने के खिलाफ थीं। यह विचार आज भी काम का है, बशर्ते उसे नारे की तरह न दोहराया जाए। किसी बात को केवल इसलिए न मानें कि मित्र मंडली, पसंदीदा दल या ट्रेंडिंग सूची वही कह रही है। और किसी बात को केवल इसलिए न नकारें कि वह लोकप्रिय नहीं है।वेबसाइट या अखबार का काम पाठक को गाली देना नहीं, उसके सामने प्रश्न रखना है: हम संख्या को सच मानने लगे हैं, या अब भी जाँचने की हिम्मत रखते हैं?
(एम्मा गोल्डमैन, “Minorities versus Majorities”, Anarchism and Other Essays, 1910)