कागजों पर बाढ़ प्रबंधन योजनाएं, जमीन पर सिर्फ 19% काम

विशेष रिपोर्ट | बिहार
बिहार हर साल बाढ़ की विभीषिका झेलता है। उत्तर से आने वाली नदियां प्रदेश के बड़े हिस्से को जलमग्न कर देती हैं, जिससे करोड़ों लोगों की जिंदगी और संपत्ति दांव पर लग जाती है। इस आपदा से निपटने के लिए सरकार हर साल करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत क्या है? भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) की रिपोर्ट (CAG Report No. 01 of 2026 – जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार) ने इस बात से पर्दा उठा दिया है कि किस तरह योजनाएं फाइलों में तो बहुत बड़ी होती हैं, लेकिन क्रियान्वयन के स्तर पर बुरी तरह दम तोड़ देती हैं।
लक्ष्य बड़ा, उपलब्धि बेहद छोटी: आंकड़ों की जुबानी
कैग ने अपनी रिपोर्ट में बिहार के तीन प्रमुख नदी बेसिनों से जुड़े सात चुनिंदा बाढ़ प्रबंधन और तटबंध निर्माण योजनाओं की गहन जांच की। इन सात योजनाओं के आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
- योजनाओं का दायरा: 7 बाढ़ प्रबंधन योजनाएं, 3 नदी बेसिन।
- क्या योजना थी: कुल 436 किलोमीटर लंबे तटबंधों का निर्माण करना।
- क्या वास्तव में बना: केवल 81.48 किलोमीटर।
- नतीजा: योजनाबद्ध लंबाई का महज 19% हिस्सा ही बन पाया, यानी चार-पाँचवां हिस्सा (354.52 किमी) आज भी अधूरा या कागजों में ही लटका हुआ है।
शुरुआत से ही समस्याओं का शिकार: जमीन का अभाव और टेंडर की हड़बड़ी
कैग की रिपोर्ट बताती है कि इन परियोजनाओं के पिछड़ने की मुख्य जड़ें निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही मजबूत हो जाती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कई मामलों में बिना यह सुनिश्चित किए ही टेंडर जारी कर दिए गए कि निर्माण के लिए जरूरी जमीन उपलब्ध है या नहीं।
- जमीन तैयार नहीं, टेंडर जारी: भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी किए बिना कागजी औपचारिकताओं के आधार पर ठेके दे दिए गए।
- परिणाम: जमीन समय पर न मिलने के कारण कार्य में देरी हुई, काम बीच में ही रुक गया या कई मामलों में तो काम शुरू ही नहीं हो सका।
1 से 16 साल की लंबी देरी: समय बीतता गया, काम अधूरा रहा
दिसंबर 2024 तक की स्थिति यह थी कि जांच में शामिल सातों में से एक भी योजना पूरी नहीं हो पाई थी।
- इनमें से 2 योजनाएं तो ऐसी थीं, जिन्हें कार्य आवंटन के 2.5 से लेकर 6 वर्ष बीत जाने के बाद भी शुरू तक नहीं किया जा सका था।
- अन्य 5 अधूरी योजनाओं में देरी का यह आलम 1 वर्ष से लेकर 16 साल तक लंबा खिंच चुका था। निर्धारित समयसीमाएँ आती गईं और गुजरती गईं, लेकिन नदियाँ खतरे के निशान पर और लोग बाढ़ के मुहाने पर ही खड़े रहे।
पानी की तरह बहा जनता का पैसा: 247.80 करोड़ रुपये खर्च, फिर भी हाथ खाली
दिसंबर 2024 तक इन सात चुनिंदा योजनाओं पर कुल 247.80 करोड़ रुपये का भारी-भरकम सार्वजनिक खर्च (Expenditure) किया जा चुका था। कैग ने इन वित्तीय विवरणों की जब परतें खोलीं, तो पाया कि किस प्रकार विभिन्न योजनाओं में राशि खर्च हुई:
- बागमती बाढ़ प्रबंधन योजना: 163.64 करोड़ रुपये
- बीएफएमएस चरण V(ए): 0.65 करोड़ रुपये
- झिम, जमुरा एवं बांके: 28.97 करोड़ रुपये
- रातो नदी से जुड़ी योजना: (कुल योग में शामिल)
- कमला-बलान: 6.09 करोड़ रुपये
- महानंदा (चरण II): 21.84 करोड़ रुपये
- अन्य योजनाएं: 17.81 करोड़ रुपये (कुल व्यय: ₹247.80 करोड़)
कैग ने इनमें से कई व्ययों को निष्फल (Unfruitful), avoidable (बचने योग्य) और अनावश्यक रूप से अधिक खर्च की श्रेणी में चिन्हित किया है।
चुनिंदा चार योजनाओं की बानगी
रिपोर्ट में प्रमुखता से जिन चार योजनाओं का जिक्र किया गया है, उनकी स्थिति बेहद दयनीय है:
- बागमती (Bagmati): भूमि अधिग्रहण लंबित, काम न्यूनतम और देरी लगातार जारी।
- BFMS Phase V(a): काम शुरू ही नहीं हुआ, जबकि इसके लिए विशाल भूमि की आवश्यकता है।
- झिम, जमुरा और बांके: आंशिक कार्य हुआ, जगह-जगह अंतराल (Gaps) छूटे हुए हैं जिससे अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
- रातो: सीमित निर्माण कार्य हुआ और अधिकांश हिस्सा आज भी लंबित पड़ा है।
निष्कर्ष: सवाल वही, नदियां वही, कहानियां अलग
कैग की यह रिपोर्ट स्पष्ट रूप से प्रशासनिक लापरवाही, लचर सुस्ती और प्राथमिकताओं की कमी को उजागर करती है। आंकड़े साफ चीख-चीख कर कह रहे हैं कि बिहार में बाढ़ सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये पानी में बहा दिए गए, लेकिन धरातल पर सुरक्षा चक्र नदारद है। जब तक प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत नहीं होगी और समयबद्ध तरीके से भूमि अधिग्रहण व निष्पादन सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक बिहार के बाढ़ पीड़ितों की तकदीर नहीं बदल सकती।